चुनमुन

Kavita

हे, देवों के श्रीधर

हरा है हसरतों का बगीचा
हरी है पत्तियाँ पेड़ पौधों की
शुक्रिया, उस माली को
जो न भूला है इसे सींचना
इस ऊमस भरी धूप में |

हे, देवों के श्रीधर
स्वप्नों की दुनिया से जागो
श्रींगार करो
प्रेम के इस बाग में
एक घर बनाओ बसाओ |

लेकिन
अपने गृह प्रवेश का निमंत्रण पत्र
इस शाब्दिक सुदाम को
औपचारिकता तले ही सही
अनिवार्यतः प्रेषित करना न भूलना |

चरणों की दुहाई में
मंदिर के देवों ने कई दफा
मेरे पैरों में कील चुभोये
मैं चुप खामोश देखता सुनता रहा
मानो निर्जीव हूँ |

हे, देवों के श्रीधर
यह तुम्हारी ही लीला थी
जो उस रात दर्द में कराहता रहा
भूखे पेट मन में दहाङता रहा
और…….
मुझे इतिहास में माफ़ करना |

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2 thoughts on “हे, देवों के श्रीधर

  1. कल 08/05/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल (विभा रानी श्रीवास्तव जी की प्रस्तुति में) पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

  2. गहन अभिव्यक्ति

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